देश की मंडियों में दालों के दाम इस समय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे चल रहे हैं। म्यांमार, मोज़ाम्बिक, तंज़ानिया और कनाडा से भारी मात्रा में आयात होने के कारण दालों की कीमतें कमजोर बनी हुई हैं। व्यापारी चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह हालात जारी रहे तो चना और मसूर की रबी बुवाई पर असर पड़ सकता है। इसी को देखते हुए दाल व्यापारियों ने सरकार से आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की है, ताकि किसानों को उचित दाम मिल सकें।
कृषि मंत्रालय ने 2024-25 फसल वर्ष (जुलाई-जून) में दाल उत्पादन का लक्ष्य 29.9 मिलियन टन रखा है, जो पिछले साल से 23% ज्यादा है। लेकिन मौजूदा समय में अरहर, उड़द, मसूर और चना जैसी प्रमुख दालों के भाव MSP से नीचे चल रहे हैं। उदाहरण के लिए, उड़द और चना MSP के करीब हैं (उड़द ₹7800/क्विंटल, चना ₹5650/क्विंटल), जबकि अरहर, मसूर और मूंग के दाम MSP से 10-20% नीचे हैं।
किसानों में हतोत्साह का डर
व्यापारियों का कहना है कि यदि दाम ऐसे ही नीचे बने रहे तो किसान रबी सीजन में चना और मसूर की बुवाई घटा सकते हैं। इंडियन पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के सचिव सतीश उपाध्याय ने कहा कि "सरकार को दालों के आयात पर शुल्क बढ़ाना चाहिए ताकि किसानों को लाभकारी दाम मिलें और वे रबी सीजन में दालों की बुवाई बढ़ा सकें।"
रिकॉर्ड आयात और बफर स्टॉक का दबाव
भारत ने 2024-25 में अब तक 7.34 मिलियन टन दालों का रिकॉर्ड आयात किया है। वर्तमान में पीली मटर, अरहर और उड़द का आयात मार्च 2026 तक शुल्क-मुक्त है, जबकि चना और मसूर पर 10% आयात शुल्क मार्च 2026 तक लागू है। भारत अपनी कुल खपत का लगभग 15-18% हिस्सा आयात करता है।
सरकार के बफर स्टॉक नियम (3.5 मिलियन टन) के मुकाबले नाफेड और NCCF के पास अभी 2.48 मिलियन टन दालें हैं, जिसमें मूंग (0.90 MT), मसूर (0.64 MT) और अरहर (0.60 MT) का सबसे बड़ा हिस्सा है। इनमें से कुछ मसूर का स्टॉक आयात से भी बनाया गया है।
मंदी में राहत, महंगाई घटी
जुलाई में सीरियल महंगाई घटकर 3.03% रही, वहीं दालों की महंगाई लगातार छह महीने से गिरते हुए पिछले महीने 13.76% तक नीचे आई। अगस्त 2024 में यही महंगाई 113% तक पहुंच गई थी। अच्छी फसल और पर्याप्त आयात की वजह से बाजार में दाम काबू में हैं।
कृषि मंत्रालय का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में घरेलू उत्पादन बढ़ाकर दालों पर आयात निर्भरता कम की जाए।