देश के तुवर (अरहर) बाजार में इस समय साफ तौर पर तेज़ी का माहौल बना हुआ है। घरेलू उत्पादन में बड़ी कमी, आयात महंगा होना और सरकारी खरीद नीति के असर से मंडियों में सप्लाई लगातार घट रही है। बाजार सूत्रों के अनुसार आने वाले समय में तुवर के भाव 9000 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर तक पहुंच सकते हैं।
इस वर्ष तुवर उत्पादन में गिरावट का सबसे बड़ा कारण बेमौसमी और अत्यधिक बारिश रही। महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक जिलों अकोला, जलगांव, जालना और बुलढाणा में बुआई के समय से लगातार बारिश होती रही, जिससे खेतों में पानी भर गया और फसल की जड़ों को भारी नुकसान पहुंचा। कर्नाटक के तालीकोटी, गुलबर्गा और बीदर क्षेत्रों में खरीफ तुवर की फसल प्रभावित हुई, वहीं मध्य प्रदेश के नीमच और कटनी में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह की तेज बारिश ने पैदावार घटा दी। झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार में रबी फसल भी नुकसान से नहीं बच सकी। विशेषज्ञों के अनुसार तुवर की फसल के लिए ज्यादा पानी बेहद नुकसानदायक होता है, और इस बार यही स्थिति उत्पादन में बड़ी गिरावट की वजह बनी।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल देश में तुवर का उत्पादन करीब 54–55 लाख मीट्रिक टन था, जबकि इस साल यह घटकर सिर्फ 37–38 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यानी करीब 30 प्रतिशत की सीधी कमी बाजार में दबाव बना रही है।
सरकारी नीति ने भी बाजार की धारणा को मजबूती दी है। सरकार ने तुवर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 450 रुपये बढ़ाकर 8000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्य में MSP पर खरीद लगभग पूरी हो चुकी है, जिससे उत्पादक इलाकों से खुला माल मंडियों में नहीं आ रहा। इसका सीधा असर यह हुआ कि हाजिर बाजारों में तुवर की उपलब्धता तेजी से घट गई।
दूसरी ओर आयात मोर्चे पर भी राहत नहीं है। रंगून (म्यांमार) बाजार में पिछले एक पखवाड़े में तुवर के भाव 60–65 डॉलर प्रति टन बढ़ चुके हैं और फिलहाल 920–925 डॉलर प्रति टन के आसपास चल रहे हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने आयात लागत को और बढ़ा दिया है, जिसके चलते चेन्नई बंदरगाह पर आयातक ऊंचे भाव बोल रहे हैं।
सप्लाई चेन में भी स्पष्ट कमी देखी जा रही है। चेन्नई बाजार में व्यापारी हाजिर सौदों के बजाय फरवरी–मार्च डिलीवरी के सौदे अधिक बुक कर रहे हैं। पाइपलाइन में उपलब्ध माल घट रहा है और कंटेनर बुकिंग में भी कमी दर्ज की जा रही है, जिससे आने वाले महीनों में सप्लाई और टाइट होने की आशंका है।
बाजार जानकारों के अनुसार मौजूदा हालात में दाल मिलों के लिए अभी हाजिर खरीद करना बेहतर माना जा रहा है, क्योंकि स्टॉक का दबाव बिल्कुल नहीं है और भाव में आगे और तेजी की संभावना बनी हुई है। व्यापारियों के लिए फरवरी–मार्च डिलीवरी के सौदे फायदेमंद रह सकते हैं, जबकि उपभोक्ताओं को आने वाले समय में तुवर दाल के महंगे होने के संकेत मिल रहे हैं, ऐसे में सीमित स्तर पर स्टॉकिंग करना समझदारी भरा कदम हो सकता है।