भारत ने चावल और गेहूं उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है और अब सरकार का ध्यान संतुलित खाद्य, ऊर्जा और जल सुरक्षा की दिशा में केंद्रित है। यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा में प्रश्न के उत्तर में दी।
मंत्री ने बताया कि सरकार का पहला लक्ष्य गेहूं और चावल में आत्मनिर्भर बनना था, जिसे अब पूरा कर लिया गया है। भारत न केवल इन दोनों फसलों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में कर रहा है, बल्कि निर्यात भी कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत लगभग 15 करोड़ टन उत्पादन के साथ विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है और इस मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया है।
हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि धान की खेती में पानी की खपत अधिक होती है। इसे ध्यान में रखते हुए कम समय और कम पानी में तैयार होने वाली किस्मों के विकास पर कार्य किया जा रहा है। साथ ही, लगातार जलभराव वाली पारंपरिक पद्धति से बचने के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सरकार द्वारा पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके तहत दालें, तिलहन, मोटे एवं पौष्टिक अनाज, मक्का, जौ, कपास और एग्रोफॉरेस्ट्री को बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्यों के माध्यम से किसानों को वित्तीय सहायता भी दी जा रही है, जिसमें दालों के लिए ₹9,000 प्रति हेक्टेयर, मक्का और जौ के लिए ₹7,500, हाइब्रिड मक्का के लिए ₹11,500 तथा पौष्टिक अनाजों के लिए ₹7,500 प्रति हेक्टेयर की सहायता शामिल है।
मंत्री ने बताया कि दालों की सुनिश्चित खरीद, सस्ते आयात पर नियंत्रण के लिए आयात शुल्क, किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने के उपाय तथा कृषि अवसंरचना कोष (AIF), पीएम-कुसुम और ग्रामीण विकास कार्यक्रम जैसी पहलों के माध्यम से किसानों को ‘अन्नदाता’ से ‘ऊर्जादाता’ बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इन प्रयासों से आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में किसानों की भूमिका और मजबूत हो रही है।